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पत्नी के दबाव में बेटे ने 80 साल की माँ को बस स्टैंड पर छोड़ा : मंदसौर की घटना और आध्यात्मिक सबक

Go Spiritual News Magazine & App: 6 फरवरी 2026

मध्य प्रदेश के मंदसौर से आई एक मार्मिक घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। एक 80 वर्षीय बुज़ुर्ग महिला को बस स्टैंड पर अकेले, रोते हुए बैठे पाया गया। गुलाबी फूलों वाली साड़ी पहने, आँखों पर चश्मा लगाए वह माँ बार-बार अपने आँसू पोंछ रही थीं। उनके आसपास बसें और यात्री आते-जाते रहे, लेकिन उनकी पीड़ा को देखने वाला कोई अपना नहीं था। इस दृश्य का एक छोटा वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और लोगों की आँखें नम हो गईं। बताया जा रहा है कि उन्हें उनके ही परिवार ने वहाँ छोड़ दिया था।

वीडियो के साथ सामने आई जानकारी के अनुसार, यह बुज़ुर्ग महिला एक स्कूल शिक्षक की माँ हैं। घर में बहू के साथ कथित विवाद और दुर्व्यवहार के बाद परिवार ने उन्हें बेटी के घर भेजने का फैसला किया। लेकिन दुर्भाग्यवश, उन्हें सुरक्षित यात्रा के लिए साथ ले जाने के बजाय बस स्टैंड पर सामान के साथ छोड़ दिया गया। वह घबराई हुई, भ्रमित और अनजान लोगों के बीच रोती रहीं।

स्थानीय प्रशासन ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पैरेंट्स एंड सीनियर सिटिज़न्स एक्ट, 2007 के तहत जाँच शुरू कर दी है, जिसके अनुसार बच्चों का अपने माता-पिता की देखभाल करना कानूनी जिम्मेदारी है। इस घटना को लेकर लोगों में गहरा आक्रोश है। सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि माता-पिता बोझ नहीं, बल्कि हमारे जीवन की नींव होते हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से: कोई अपनी माँ को कैसे छोड़ सकता है?

यह घटना हमें एक गहरा आध्यात्मिक प्रश्न पूछने पर मजबूर करती है—जिस माँ ने जन्म दिया, पाला-पोसा, उसकी उपेक्षा कैसे की जा सकती है?

हिंदू धर्म में माता-पिता को साक्षात देवता माना गया है। तैत्तिरीय उपनिषद का प्रसिद्ध वाक्य है—
“मातृ देवो भव, पितृ देवो भव”
अर्थात माँ और पिता देवता के समान हैं।

माँ का प्रेम, त्याग और करुणा ईश्वर की ही तरह निःस्वार्थ होती है। वृद्धावस्था में उन्हें छोड़ देना धर्म के मार्ग से भटकना है। भगवद गीता भी सिखाती है कि स्वार्थ और अहंकार से किए गए कर्म आत्मा के संतुलन को बिगाड़ देते हैं और कर्मों का बोझ बढ़ाते हैं।

आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी, छोटे परिवार, करियर और भौतिक सुखों की दौड़ में हम कई बार संवेदना भूल जाते हैं। बुज़ुर्गों को बोझ समझने लगते हैं, जबकि वे हमारे लिए आशीर्वाद और अनुभव का भंडार होते हैं। कोई भी परिस्थिति उस माँ को छोड़ने का बहाना नहीं बन सकती जिसने हमारी हर साँस के लिए दुआ की।

यह घटना आत्मचिंतन का अवसर है—
क्या हम अपने कर्मों के परिणामों को समझते हैं?
कृतज्ञता, सेवा (सेवा भाव), ध्यान और धर्मग्रंथों का अध्ययन हमें फिर से सही रास्ते पर ला सकता है और परिवारों में प्रेम लौटा सकता है।

बुज़ुर्गों की स्थिति: करुणा और ज़िम्मेदारी की पुकार

मंदसौर की यह घटना अकेली नहीं है। देशभर में सामाजिक बदलाव, शहरीकरण और पारिवारिक ढांचे के बदलने से कई बुज़ुर्ग अकेलेपन और उपेक्षा का सामना कर रहे हैं। जिस उम्र में उन्हें सहारे और स्नेह की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, वहीं वे सबसे अधिक अकेले रह जाते हैं।

बौद्ध धर्म की करुणा और जैन धर्म की अहिंसा हमें सिखाती है कि कमजोर और असहाय की सेवा से आत्मा ऊँची होती है। किसी बुज़ुर्ग का हाथ थामना, उनके साथ समय बिताना, धैर्य और प्रेम दिखाना—यह सब ईश्वर की सच्ची पूजा है।

समाज और समुदाय भी मदद कर सकते हैं—आध्यात्मिक समूहों, वरिष्ठ नागरिक सेवा कार्यक्रमों और नियमित संवाद के माध्यम से। कानून अपना काम करेगा, लेकिन सबसे ज़रूरी है दिल से रिश्तों को निभाना और पीढ़ियों के बीच सम्मान की भावना को फिर से जीवित करना।

जैसा कि वीडियो में किसी ने कहा—दूसरों को पढ़ाने वाला भी कभी-कभी अपनी माँ का ख्याल नहीं रख पाता।
यह घटना हमें याद दिलाए कि सच्ची इंसानियत इस बात में है कि हम अपने बुज़ुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं—जिन्होंने कभी हमें अपनी बाहों में सुरक्षित रखा था।

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