
अच्युतकृष्ण शरण
२१ वीं सदी की आधुनिक, उच्च तकनीकयुक्त, सूचना संपन्न और तीव्रगामी वैश्विक सभ्यता में धर्म और आध्यात्मिकता की परिभाषा बदलनी नहीं चाहिए थी।
लेकिन विडंबना है कि आज धर्म केवल पारंपरिक कर्मकांड, बाहरी पूजा-पद्धति, मंत्रोच्चारण, गेरुए वस्त्र या बाहरी प्रतीकों के प्रदर्शन तक सीमित होता जा रहा है। मानव इतिहास साक्षी है कि धर्म का मूल उद्देश्य कभी भी केवल अनुष्ठानों की औपचारिकता निभाना या भीड़ इकट्ठा करना नहीं था। इसका वास्तविक उद्देश्य तो मनुष्य को मानवता की उच्चतम चेतना की ओर उन्मुख करना, समाज को विभाजन और द्वेष से बचाना तथा व्यक्ति को करुणा, सत्य और सह-अस्तित्व के आधार पर भीतर से रूपांतरित करना था।
लेकिन वर्तमान सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक यथार्थ को निकट से देखने पर धर्म की यही मूल आत्मा धीरे-धीरे विकृत, प्रदूषित और व्यावसायिक होती दिखाई देती है। जहाँ धर्म को प्रेम की सुगंध फैलानी चाहिए थी, वहीं आज प्रतिस्पर्धा, बाज़ारवाद, भौतिक प्रदर्शन और प्रभुत्व स्थापित करने वाले अहंकार की ध्वनि अधिक सुनाई देने लगी है। धर्म, जो आत्मिक शांति, मानसिक संतुलन और सामाजिक सद्भाव का मार्ग था, आज कुछ कॉर्पोरेट शैली के आश्रमों और गुरुओं के कारण पहचान, शक्ति, राजनीतिक पहुँच और आर्थिक साम्राज्य विस्तार का साधन बनता जा रहा है।
आज धर्म केवल आस्था, व्यक्तिगत साधना और आंतरिक परिवर्तन का विषय नहीं रह गया है। यह एक सुनियोजित “ब्रांडिंग”, आक्रामक “मार्केटिंग” और “फॉलोअर इकोनॉमी” जैसी बहुराष्ट्रीय व्यावसायिक संरचना में परिवर्तित होता दिखाई देता है। सोशल मीडिया की दीवारों से लेकर सार्वजनिक प्रवचन मंचों तक, आध्यात्मिकता के नाम पर प्रतिस्पर्धी प्रचार, प्रायोजित आत्मप्रशंसा और डिजिटल अनुयायियों की संख्या दिखाने की होड़ आम हो चुकी है। आधुनिक संचार माध्यमों का दुरुपयोग कर धार्मिक मंचों को भावनाओं के व्यापार का केंद्र बना दिया गया है।
ऐसे भौतिकवादी वातावरण में आधुनिक समाज के सामने कुछ गंभीर प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है ।
क्या धर्म अब आत्मशुद्धि की साधना है या आत्मप्रदर्शन और संपत्ति अर्जित करने का मंच?
क्या ‘गुरु’ का आसन सेवा, त्याग, वैराग्य और विनम्रता का सर्वोच्च प्रतीक है या राजनीतिक प्रभाव, अपार धन और सस्ती लोकप्रियता का केंद्र?
जहाँ संवेदनशीलता और करुणा समाप्त होने लगती है, वहाँ आत्मप्रचार और भौतिक महत्वाकांक्षाएँ बढ़ने लगती हैं। वहाँ धर्म की आत्मा मृतप्राय हो जाती है। सत्य की उपेक्षा कर बाहरी आडंबरों पर खड़ा धार्मिक साम्राज्य चाहे जितना भव्य दिखाई दे, अंततः वह समाज को नैतिक अंधकार की ओर ही धकेलता है।
वैदिक सनातन धर्म दर्शन और विश्व के महान धार्मिक सिद्धांतों ने सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” का उच्च आदर्श प्रस्तुत किया है। किंतु जब यही आदर्श दोहराने वाले संकीर्ण विचारधारा के संचालक समाज में विभाजन, घृणा, सांप्रदायिक विद्वेष और श्रेष्ठता की तुच्छ प्रतिस्पर्धा में उतर आते हैं, तब धर्म और पाखंड के बीच की सीमा रेखा धुंधली होने लगती है।
जहाँ धर्म को समाज के सभी वर्गों को जोड़ने वाला पुल बनना चाहिए, वहाँ यदि कोई विचार, संप्रदाय, संस्था या स्वयंभू विशिष्ट व्यक्ति दूसरों को तुच्छ, अशुद्ध या शत्रु मानने की प्रवृत्ति विकसित करता है, तो वह आध्यात्मिकता नहीं है। वह केवल वैचारिक अहंकार और अधार्मिक कट्टरता है। अहंकार किसी भी पवित्र वेशभूषा या भाषा में प्रकट हो, वह आध्यात्मिकता का पहला शत्रु है। करुणा और घृणा एक ही हृदय में साथ नहीं रह सकतीं। इसलिए जो दूसरों के अस्तित्व के प्रति असहिष्णु है, वह कैसे ‘धार्मिक’ या ‘परमपूज्य धर्मगुरु’ हो सकता है?
मेरा मानना है कि सच्चा गुरु वह है जो शिष्य को अपनी ओर नहीं, बल्कि शाश्वत सत्य की ओर उन्मुख करे। जो व्यक्ति-पूजा के चक्रव्यूह से मुक्त कर विवेक का मार्ग दिखाए। जो विनम्रता सिखाए और शिष्य के मन में उठने वाले तार्किक प्रश्नों को दबाने के बजाय प्रोत्साहित करे। किंतु आज की तथाकथित गुरु परंपरा आत्मप्रशंसा, अंधानुकरण, प्रश्नहीन अनुयायित्व और व्यावसायिक नेटवर्क में बदलती जा रही है। परिणामस्वरूप समाज में स्वस्थ श्रद्धा नहीं, बल्कि भयावह अंधभक्ति का जन्म हो रहा है।
अंधभक्ति का सबसे बड़ा सामाजिक खतरा यही है कि यह मनुष्य की सोचने और समझने की क्षमता को कमजोर कर देती है। आलोचनात्मक चेतना को निष्क्रिय बना देती है और सही-गलत में अंतर करने की शक्ति छीन लेती है। ऐसी बौद्धिक गुलामी की स्थिति में धर्म के नाम पर होने वाले शोषण, ठगी, अभद्र व्यवहार और असामाजिक गतिविधियाँ भी सहज स्वीकार्य होने लगती हैं। जब समाज प्रश्न पूछने से डरने लगता है, तब पाखंड संस्थागत रूप धारण कर लेता है।
आज के बौद्धिक समाज को आत्ममंथन करते हुए इन प्रश्नों का उत्तर खोजने की आवश्यकता है ।
क्या करुणा, विनम्रता, अपरिग्रह और सत्य का अभ्यास न करने वाला व्यक्ति किसी का आध्यात्मिक मार्गदर्शक हो सकता है?
क्या दूसरों की आस्था और अस्तित्व पर विषवमन कर, समाज में सांप्रदायिक विभाजन पैदा करके कोई व्यक्ति सच्चा धार्मिक गुरु कहलाने योग्य है?
मेरे विचार में धर्म कोई आकर्षक भाषण नहीं है, कोई विशेष पोशाक नहीं है और न ही कोई संस्थागत कॉर्पोरेट संरचना। धर्म तो मनुष्य के दैनिक व्यवहार और चरित्र में स्वाभाविक रूप से प्रकट होने ली चेतना है। यदि किसी व्यक्ति के आचरण में करुणा नहीं, व्यवहार में सह-अस्तित्व की भावना नहीं और विचारों में विनम्रता नहीं है, तो उसकी बाहरी धार्मिकता केवल एक कुशल अभिनय या व्यावसायिक आवरण मात्र है।
सच्चा धर्म लोगों के बीच दूरी नहीं बढ़ाता, बल्कि टूटे हुए संबंधों को जोड़ता है, घायल मनों पर मानवता का मरहम लगाता है और समाज में अविश्वास की खाई को भरकर विश्वास का पुनर्निर्माण करता है। धर्म की वास्तविक परीक्षा किसी भव्य मंदिर, आश्रम, महंगे यज्ञ या प्रवचन मंच पर नहीं होती; बल्कि दैनिक जीवन के व्यवहार, संकटग्रस्त लोगों की सहायता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व में होती है। आचरणविहीन धर्म एक निर्जीव शव के समान है, जिसे चाहे जितना सजाया जाए, वह सुगंध नहीं फैला सकता।
अब समाज को धर्म को व्यापारिक और संकीर्ण बंधनों से मुक्त कर उसके वास्तविक, उदात्त और मानवीय स्वरूप में पुनर्स्थापित करने का साहस करना होगा। केवल बाहरी आडंबर, चमत्कारों के भ्रम और महंगे अनुष्ठानों को आध्यात्मिकता मानने वाले सामूहिक सम्मोहन से बाहर निकलना आवश्यक है। धर्म के नाम पर पर्दे के पीछे चल रहे शक्ति-खेल, राजनीति, भावनात्मक शोषण और अनुयायियों की संख्या बढ़ाकर किए जाने वाले ‘इमोशनल ब्लैकमेल’ पर प्रश्न उठाने का समय आ चुका है।
यह वैचारिक संघर्ष किसी एक व्यक्ति, संस्था या धार्मिक संप्रदाय के विरुद्ध नहीं है; बल्कि यह समूची सामाजिक चेतना के शुद्धिकरण और जागरण का अभियान है। हमें स्वयं से पूछना होगा—हम वास्तव में किसकी पूजा कर रहे हैं? सत्य और मानवता की, या केवल भव्य आवरण और अभिनय की?
अंततः संसार के सभी दार्शनिक निष्कर्षों और धार्मिक ग्रंथों का सार एक ही वाक्य में समेटा जा सकता है ।
जो जगत को जोड़ता है और कल्याण करता है, वही धर्म है। जो समाज और मानवता को तोड़ता है तथा घृणा फैलाता है, वही अधर्म है। जो मनुष्य के भीतर करुणा और सेवा की भावना जगाता है, वही वास्तविक अध्यात्म है। जो अहंकार, सांप्रदायिकता और श्रेष्ठता का उन्माद बढ़ाता है, वह केवल धार्मिक बाज़ार का व्यावसायिक आवरण है।
आवरण में चाहे जितनी दिव्यता, भव्यता और ‘परमपूज्यता’ का दावा किया जाए, यदि व्यक्ति के आचरण और व्यवहार में न्यूनतम मानवता, नैतिकता और ईमानदारी नहीं है, तो वह आध्यात्मिकता नहीं है। वह केवल धर्म के नाम पर किया गया पाखंड और प्रपंच है।

इतिहास साक्षी है कि पाखंड और भ्रम का जीवन कभी दीर्घकालिक नहीं होता। वह कुछ समय तक समाज को भ्रमित कर सकता है, लेकिन अंततः समाज के भीतर गहरे अविश्वास और नैतिक पतन के घाव छोड़ जाता है। इसलिए वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा के लिए यह प्रश्न केवल दूसरों से नहीं, स्वयं से भी पूछना आवश्यक है ।
क्या हम धर्म और नैतिकता के माध्यम से एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण कर रहे हैं, या धर्म के अंधानुकरण में अपनी मौलिक मानवीय चेतना ही खोते जा रहे हैं?
लेखक देवभूमि नेपाल के गोरखा जिला स्थित ‘राजविद्या शक्तिपीठ’ के पीठाधीश हैं। उन्होंने भारत के वृंदावन के साथ-साथ नेपाल के हिमालयी क्षेत्रों एवं विभिन्न शक्तिपीठों में दीर्घकाल तक कठिन तपस्या और साधना की है।